न्यूटन रिव्‍यू: कुछ नहीं बदलोगे तब तक कुछ नहीं बदलेगा

डायरेक्टरः अमित मसुरकर
कलाकारः राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, अंजली पाटिल, रघुबीर यादव
रेटिंग-5 स्टार

दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी है हमारा इंडिया और इस डेमोक्रेसी का सबसे बडा इवेंन्ट है हमारा चुनाव। 80 करोड़ मतदाता, 90 लाख पोलिंग बूथ और तकरीबन 30 हजार करोड़ से ज्यादा का खर्चा इस चुनाव में लगता है। इंडिया की इतने बड़े डेमोक्रेसी के निचले हिस्से में क्या छुपा हुआ है इसकी पोल न्यूटन में खुलती दिखाई पड़ रही है।

बहुत सालों पहले एक न्यूटन आया था जिसने अपनी खोज से इतिहास बदल दिया था। अब एक बार फिर से पैदा हुआ यह नया न्‍यूटन इतिहास रचेगा।

आइए बात करते हैं फिल्‍म की कहानी की। तो कहानी एक न्‍यूटन सरकारी कर्मचारी की है, लेकिन अन्‍य कर्मचारी इसके जैसे नहीं हैं। उसे अपने कर्तव्य और हक की जानकारी है।
यह न्‍यूटन बदलाव लाना चाहता है और उसका मानना है कि जानता है कि जब तक खुद नहीं बदलोगे तब तक कुछ नहीं बदल सकता।

कहानी छत्‍तीसगढ़ के एक नक्सल इलाके के एक गांव की है। इस गांव में केवल 76 मतदाता हैं। जहां लोकसभा चुनाव के दौरान न्‍यूटन की ड्यूटी लगी है। ऐसे जगह पर चुनाव के नाम होने वाले मजाक पर दिग्दर्शक अमित मसूरकर ने उंगली रखी है।

देखा जाए तो यह एक ब्‍लैक कॉमेडी फिल्‍म है। हॉं पर जान बुझकर किया गया विनोद नहीं तो एक सीटुएशनल कॉमेडी है। नक्सलग्रस्त इस इलाके में चुनाव में बदलाव लाने की कोशिश ये न्‍यूटन घुंघराले बालों वाला, आंखें मिचकाने वाला, सरकारी टेबल पर ताश के पत्तों से नफ़रत करने वाला, सवाल करने वाला है।

यहॉं उसे क्या हासिल होता है यह देखने के लिए आपको सिनेमा जाना पड़ेगा। हालांकि एक बात है यह सिनेमा देखकर प्रेषक बहुत कुछ हासिल कर पायेंगे।

फिल्म में अभिनय की बात करें तो राजकुमार राव अपनी हर नई फिल्म से कुछ ज्यादा देने की कोशिश करते हैं। हर किरदार को वो ऐसे निभाते हैं, जैसे इसे उन्‍हें देखकर ही लिखा गया हो। न्‍यूटन के पात्र को उनसे अच्छा न्याय कोई और दे ही नहीं सकता था।

उनके अलावा वासेपूर, बरेली की बर्फी जैसे फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाने वाले पंकज त्रिपाठी यहॉं सुरक्षा अधिकारी जिन के ऊपर चुनाव सही सलामत हो जाए वो जिम्मा है।
यह किरदार भी उन्‍होंने बखूबी निभाया है। इनके अलावा अंजली पाटील, रघुवीर यादव या छोटी सी भूमिका में संजय मिश्रा ने अपने किरादार में जान डाल दी।

फिल्म की सबसे खास बात है कि डायरेक्टर ने बताया कि कही भी वो यह जताते नहीं कि हम कुछ बड़ा कर रहें हैं। सच कहें तो ऐसी पटकथा लिखना और प्रभावी सवांद लिखना सबसे मुश्‍किल काम है। लेकिन अमित मुसरकर और मयंक तिवारी ने यह काम अच्छे से किया है।
अमित अपने हर एक फ्रेम से कुछ बात करना चाहते हैं। अगर आपके वो समझ आये तो यह फिल्म आपको भरपूर मनोरंजन देगी।

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