नाजायज बच्चों के दर्द की कहानी है नामकरण

Naamkaranमुंबइ। स्टार प्लस पर बोलिवूड फिल्म निर्देशक महेश भट्ट का एक नया शो शुरू हुआ हैं, जिसका नाम हैं नामकरण। इसके साथ ही महेश भट्टने टेलिविजन की दुनियामां अपनी इनिंग की शुरूआत की हैं।

इस शो के नाम के जरिये ही महेश भट्टने बहोत कुछ कहेने की कोशिश की हैं। ये कहानी महेश भट्ट की अपनी कहानी हैं। जो एक नाजायज बच्चे के दर्द को बयां करती हैं। साथ ही सवाल उठाती हैं समाज के उन खोखले रिवाजो पर जो कुछ बच्चो को नाजायज होने पर मजबूर करती हैं।

महेश भट्ट के पिता नानाभाइ भट्ट एक गुजराती चुस्त ब्राह्मिन थे जबकि उनकी मां शीरीन एक मुसलमान। जाहिर सी बात हैं जाति और धर्म के नाम पर लडनेवाले लोगो के इस देश में एसे रिश्ते को कभी नाम नही मिलता। बस यही हुआ महेश भट्ट के माता-पिता के साथ। उनके पिता नानाभाइ भट्ट शीरीन से बेइम्तिहां प्यार करने के बावजूद उन्हे जींदगीभर अपना ना शके। और शीरीन को भी समाज में कभी वो स्थान नही मिला जो एक शादी शुदा ओरत को मिलता हैं। इन दोनो के अलावा वो बच्चा भी था जो समाज के इन जूठे रिवाजो का शिकार हुआ, जो उनके असीम प्रेम की निशानी था। पर जमाने ने उसे नाजायज करार दे दिया।

इसी बच्चे की कहानी हैं नामकरण। हमारे इस पुरुष प्रधान समाज में बच्चे के नाम के साथ हंमेशा बाप का नाम जूडता हैं। लेकिन जो बच्चे नाजायज कहेलाए जाते हैं उनके नाम के साथ हंमेशा एक सवाल जुडा रहेता हैं। महेश भट्टने अपने एक इन्टरव्यु में कहा था की हमारी रिपोर्ट कार्ड पर साइन करते वक्त मां के हाथ कांपते थे। महेश भट्टने ये जाहिर करने में कभी शर्म महेसूस नही की के वो एक नाजायज औलाद हैं।

इससे पहेले भी महेश भट्टने अपनी कहानी फिल्म जख्म में दिखा चूके हैं( जिसके लिए अभिनेता अजय देवगन को नेशनल एवोर्ड मिला था), फर्क सिर्फ इतना हैं कि नामकरण में नायाजय बच्चे की भूमिका एक लडकी निभां रही हैं। शायद ये बात ही नामकरण को और दिलचस्प भी बनाती हैं कि अगर कोइ लडकी नाजायज हैं तो उसके लिये परिस्थितीयां और भी विकट हो सकती हैं।

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