मौजूदा दौर की फिल्मों में गहराई की कमी : सुभाष घई

बॉलीवुड के शोमैन कहलाने वाले फिल्मकार सुभाष घई का मानना है कि मौजूदा दौर की फिल्मों से उसका सार गायब है। वह कहते हैं कि निर्देशक कहानी पर ध्यान देने की बजाय फिल्म के व्यापार को बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं और इसलिए वे दर्शकों से जुड़ने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं।

घई ने मुंबई से आईएएनएस को फोन पर बताया, “अब पैसे लेकर फिल्म बनाने का चलन हो गया है, यही कारण है कि लोग परियोजनाएं बना रहे हैं, लयबद्ध फिल्में नहीं.. लोकप्रिय कलाकारों को लेकर फिल्में बनाते हैं और इस तरह से बाजार में उनकी मार्केटिंग करते हैं कि चार दिनों में ही फिल्म की कमाई 100 करोड़ रुपये पार कर जाती है।”

फिल्मकार कहते हैं, “लोग अपने परिवार को यह सोचकर फिल्म दिखाने ले जाते हैं कि फिल्म के जरिये वे एक नई दुनिया का एहसास करेंगे और घर कुछ ऐसी यादें ले जाएंगे जो हमेशा उनके साथ रहेंगी, लेकिन आजकल फिल्मों को देखना उपन्यास पढ़ने जैसा ही है। हम कहानी पढ़ते हैं और इससे बिना कुछ ग्रहण किए घर वापस आते हैं।”

अपने निर्देशन करियर का साल 1976 में फिल्म ‘कालीचरण’ से आगाज करने वाले घई ने ‘कर्ज’, ‘राम लखन’, ‘सौदागर’, ‘खलनायक’, ‘कर्मा’ और ‘ताल’ जैसी बेहतरीन फिल्में दी हैं।

उनकी पिछली फिल्में ‘युवराज’, ‘कांची : द अनब्रेकेबल’ और ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ बॉक्स ऑफिस पर अपना जादू नहीं बिखेर पाई थीं।

घई (72) फिलहाल मुक्ता ए2 सिनेमा (बैनर मुक्ता आर्ट्स लिमिटेड का डिविजन) के जरिये अपनी फिल्मों को फिर से रिलीज करने की योजना पर काम कर रहे हैं। इसकी शुरुआत वह फिल्म ‘ताल’ से करेंगे।

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